योग की प्राचीन परंपरा और अष्टांग योग में ‘यम’ का महत्व - योगाचार्य डॉ नवीन सिंह
बस्ती। संसार में योग की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध मानी जाती है। वैदिक संहिताओं के अनुसार ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों द्वारा प्राचीन काल से ही योग का अभ्यास किया जाता रहा है। योग का उल्लेख वेदों में भी मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है। योग के प्रसिद्ध ग्रंथ पतंजलि योगदर्शन में योग की विस्तृत व्याख्या की गई है, जिसमें कहा गया है— “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् मन की वृत्तियों पर नियंत्रण ही योग है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी योग की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा है— “योगः कर्मसु कौशलम्” यानी कर्मों में कुशलता ही योग है। इससे स्पष्ट होता है कि योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का माध्यम भी है।
योग के आठ अंग होते हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग का उद्देश्य चित्त के अज्ञानरूपी प्रवाह को स्थिर कर उसे ज्ञानरूपी प्रवाह की ओर ले जाना है। इसके लिए नियमित अभ्यास और अनुशासन आवश्यक माना गया है। अष्टांग योग के आठ अंग हैं— यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
संकल्प योग वैलनेस सेंटर, कटेश्वर पार्क, बस्ती के योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह ने बताया कि अष्टांग योग का प्रथम अंग यम है। यम शब्द ‘यम उपरमे’ धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है— निवृत्त होना या छूट जाना। इस प्रकार यम वह नियम है, जिसके पालन से व्यक्ति दुखों से मुक्त होता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो यम वह आचार-संहिता है, जो मनुष्य को नैतिक और सदाचारी जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह के अनुसार, यम समाज में नैतिक तरीके से रहने की शिक्षा देता है और व्यक्ति के आचरण को शुद्ध करता है। यम के कुल पाँच प्रकार होते हैं, जिनका विस्तृत वर्णन आगामी पोस्ट में किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि योग केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में सद्भाव, अनुशासन और नैतिक मूल्यों की स्थापना का भी सशक्त माध्यम है।
योग से जुड़े इन महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी के लिए पाठकों से जुड़े रहने की अपील की गई है।


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